आईये कार्टून तलाशें

Thursday, November 12, 2009

देखिये,क्या सुनकर भड़के राज ठाकरे...?

Wednesday, November 11, 2009

क्या अब दिल्ली मैं चुनाव नहीं होंगे?

Tuesday, November 10, 2009

आज प. बंगाल मैं हुई भीषण 'रेल दुर्घटना ' की ताज़ा तस्वीर !

Monday, November 9, 2009

वहशियों ने मां को भी नहीं छोड़ा !!

Sunday, November 8, 2009

तो क्या सचिन अब यह रिकार्ड बनाने के चक्कर मैं है??

Saturday, November 7, 2009

कार्टूनिस्ट डाइलिसिस मशीन होता है:प्रभाष जोशी


बात १९८६ की है.में ग्वालियर मैं अपने कार्टूनिस्ट करिअर के एकदम शुरुआत के दिनों मैं था .एक साल पहले मेरी मां का निधन हुआ था,उनकी याद मैं में अपने कार्टूनों की प्रदर्शनी लगानाचाहता था.चूंकि किसी भी कार्टूनिस्ट का मूल्यांकन एक अच्छा सम्पादक कर सकता है,इसलिए मैंने सोचा कि देश के ऐसे सम्पादक को बुलाऊँ ,जिसके यहाँ कार्टूनों की इज्ज़त होती हो.ज़हन मैं अखबार आया 'जनसत्ता' और उसके सम्पादक प्रभाषजी .मैंने एक पत्र प्रभाष जी को लिखकर अपने इच्छा जताई.उन्होंने जवाब मैं लिखा की अभी नहीं,फिर कभी जल्दी ही .दस्खत करके हाथ से उन्होंने तारीख मैं सन ८६ की जगह ८४ लिख दिया .मैंने जब वह गलती देखि,क्योंकि वोह टाइप की नहीं,हाथ की गलती थी इसलिए उसपर एक लाल गोला बनाका मैंने वह पत्र उनके अवलोकनार्थ भेज दिया.यह बात उन्हें मुझ तक ले आई .तुंरत उन्होंने पत्र लिखकर मेरी तारीफ़ की और कहा अब आप कभी भी बुलाएं ,मैं आपकी कार्टून प्रदर्शनी का उदघाटन करने ग्वालियर ज़रूनर आऊंगा.और वह आए भी. उन्होंने अपने भाषण मैं कहा की 'कार्टूनिस्ट एक डाइलिसिस मशीन ,जो समाज मैं फैली गन्दगी को साफ़ करने का प्रयास अपने कार्टूनों से करता है.और इरफान भी एक डाइलिसिस मशीन है .'
वह दिन मेरे लिए जीवन का एकदम नया दिन था.उस दिन से मेरे सपने ने अपने पर लगाये और मैं हर एक दो माह बाद ,प्रभाष जी के पास आता की शायद इस बार वह मुझे 'जनसत्ता' मैं कार्टून बाने का मौका दे दें.वह हर बार मुझे अगले एक दो माह बाद अपने यहाँ रख लेने का आश्वासन दे देते.मगर मेरा यह सपना जब तक वह संपादक रहे,दुर्भाग्य से पूरा न हो सका।
प्रभाष जी ने कार्टून को पत्रकारिता की जबरदस्त जुबां के रूप में बयान किया.एक कार्टूनिस्ट को योद्धा बनने मैं एक सम्पादक का हाथ पीठ पर होना चाहिए अगर वोह हाथ प्रभाषजी जैसे सेनापति का हो तो आप समझ सकते हैं,की उस कार्टूनिस्ट के वार कैसे होंगे.१९९० मैं नवभारत टाईम्स मैं मेरे आने के बाद लखनऊ मैं और जब भी उसके बाद मेरी उनसे मुलाक़ात हुई,वह बहुत उत्साह से मुझे आर्शीवाद देते थे .मेरा सौभाग्य था जब हिन्दी' तहलका' के सम्पादक संजय दुबे ने मुझसे कहा कि वह प्रभाषजी के मार्गदर्शन मैं तहलका निकाल रहे हैं,और संजय को मेरे कार्टून उसमें चाहिए.ये मेरे जीवन कि एक बड़ी उपलब्धि थी कि 'तहलका' की वेबसाइट पर 'दिग्गाजदीर्घा' मैं मुझे महान सम्पादक प्रभाजी के साथ स्थान मिला.इसलिए नही के वह 'तहलका' के साईट पर है,बल्कि प्रभाषजी के साथ मैं है.उनको मेरी श्रध्धांजलि.

Friday, November 6, 2009

वरिष्ठ सम्पादक प्रभाष जोशी अब हमारे बीच नहीं रहे...:-( एक श्रद्धांजलि ..

Thursday, November 5, 2009

बहुत दिनों से इन पर कार्टून बंनाने को सोच रहा था,सो आज बन गया !

Wednesday, November 4, 2009

पार्टी या डूबा जहाज ?

Tuesday, November 3, 2009

चुका सचिन फिर चूका !!